-आकांक्षा
पाण्डेय
आपा से जब
मैं पहली बार मिली, तो वे मुझे रुड लगीं। एक बार को मुझे लगा शायद वे बहुत सीनियर
पदाधिकारी होंगी और उन्हें जूनियर्स से बात करना पसंद नहीं है। लेकिन, अगले कुछ
दिनों में मैंने यह देखा कि मुझसे ही उनका कुछ टशन चलता है। वे मेरी प्यार से कही
बात का भी बड़ी गंभीर होकर दो टूक जवाब देती थीं। वे मेरे बाकी कुलीग्स की
तरह अपना सर खुला नहीं रखती थीं बल्कि हमेशा हिजाब ओढ़कर आती थीं। नमाज़ की बहुत
पक्की थीं वे। मुझे एक बार मेरी एक कुलीग ने बताया कि वे रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार
से आती हैं और बहुत कट्टर हैं। तब मुझे लगा कि शायद मेरे हिन्दू और भारतीय होने के
कारण वे मुझे पसंद नहीं करती होंगी।
एक दिन उनकी बेटी ऑफिस आई। बारह
साल की फिज़ा। बहुत प्यारी बच्ची। सलीके से सलवार - कमीज़ पहनी हुई और उस पर लाल
दुपट्टा भी सम्भाले हुए। और, पैर में अपनी मम्मी की तरह ही आगे से उँगलियों को ढँकती
जूतियाँ पहनी हुई। हम एक दूसरे से टी- कॉर्नर में टकरा गये। उसने बांग्ला में कुछ कहा, शायद माफी माँगी। और, भी बहुत कुछ वह एक ही साँस में
बोले जा रही थी, मुझे हँसी
आ गयी। मैंने प्यार से कहा, “आमी बंगला बुझी ना। व्हाट आर यु सेइंग?” बस, यहीं से हमारी बातचीत शुरू हुई। फिज़ा इंग्लिश में फ़्लुएन्ट है। इसलिए मेरी बातें अच्छे-से समझने लगी।
इतनी फ़्लुएन्टली कि मुझसे ऑफ़िस में भी कोई बात नहीं कर पाता था। फिर क्या था मैंने उससे जी भर कर
बातें कीं। हम दोनों एक दूसरे को अच्छे-से समझ पा रहे थे। भाषा कोई बैरियर नहीं रह गयी थी। बीच में उसकी किसी बात पर चौंकने
का अभिनय करते हुए मैंने हिंदी में कहा, “अरे बाबा रे! ये तो बड़ी मुसीबत
हो गयी फिर तो।” और, फिर
उसने तुरंत चौंकाते हुए हिंदी में कहा, “अरे आपको तो हिंदी आती है।” मैंने कहा, “हैरान मैं भी हूँ। तुम तो बिलकुल
मेरी तरह स्पष्ट हिंदी में बात कर रही हो?” वह हँसने लगी। बोली, “मैं तो डोरेमन की फैन हूँ न। तो भला हिंदी कैसे नहीं जानूँगी।”
हम दोनों इतने खश हुए कि फिर हमने
खूब सारी इधर-उधर की बातें कीं। अच्छी हिंदी में।
फिज़ा और मैं बहुत अच्छे दोस्त बन
गये, पहली ही मुलाकात में। बड़ी अच्छी ट्यूनिंग हो गयी हमारी। मैं थकती ही नहीं थी,
उससे बातें करते और उसकी अजब-गजब बातें सुनते। आसपास के लोग बोले, “क्या बात है, आज आकांक्षा बहुत बातें कर रही है। दोनों इतनी जल्दी घुल-मिल गये।”
मैंने मन में सोचा क्यों? समझ में आया कि एक तो फिज़ा बहुत
समझदार और संतुलित बच्ची है और दूसरी बात जो कि मेरे लिये महत्वपूर्ण थी वो ये कि हमारे बीच भाषा की
समस्या नहीं थी। उसकी हिंदी-इंग्लिश दोनों ही इतनी अच्छी थीं कि मुझे अपने दूसरे
कुलीग्स की तरह न ही उसे समझाने की जरुरत पड़ती कि मैं क्या कह रही हूँ और न ही उसे मुझसे बात
करने में कहीं भी हकलाना पड़ता। हम अपने मन की बातें तुरंत अच्छी तरह से कम्युनिकेट
कर पा रहे थे। खूब मस्ती और मज़े किये हम दोनों ने।
अपने स्कूल की एक्टिविटीज़ के बारे में बताते हुए उसने बातों-
ही- बातों में बताया कि उसे संगीत से नफरत है। मैं चौंक गयी। पर मैंने जाहिर नहीं होने दिया।
मैंने पूछा, “क्यों भई, संगीत से आपको नफरत क्यों हैॽ” तो उसने कहा, “मेरे टीचर ने कहा है कि ये अच्छी
चीज़ नहीं है। इस्लाम में बुरा संगीत हराम है।” मैंने कहा, “अच्छा! तो ये बुरा संगीत क्या होता
है?” वह चुप हो
गयी मैंने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, “मुझे तो नहीं मालूम है कि कोई
संगीत बुरा भी होता है। तुम बता सको तो मुझे भी जानने को मिलेगा।” उसने कुछ सोचा और फिर ताड़ते हुए
बोली, “नहीं, सब
संगीत बुरे नहीं होते, लेकिन बॉलीवुड के गाने अच्छे नहीं होते। वे हराम हैं।”
कुछ देर में उसकी माँ आ गयी और
उन्होंने कहा, “मैं इसे कब
से ढूँढ रही हूँ। और ये यहाँ
आपसे गप्पें लड़ा रही है। फिर, वे उसे प्यार से धमकाते हुए तुरंत लेकर चली गयीं। मुझे अच्छा नहीं लगा, पर उनसे डर भी लगता था और फिर मन
में संशय भी था कि क्या पता मेरा धर्म और राष्ट्रीयता एक फैक्टर हो इनके लिए।
मैंने फिजा को जाने दिया।
कुछ ही दिनों बाद हमारे डिविज़न
के सब लोगों को आल स्टॉफ रेसिडेंसियल गेदरिंग के लिए पाँच दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा।
होटल में दिन के सेशन के बाद रात को सब लोग यहाँ वहाँ बैठ जाते और गाना- बजाना
करते। दूसरे दिन जब मैं सोने ही वाली थी कि एक बहुत मेलोडिअस आवाज ने मुझे
जगा दिया। यह एक्सप्लोर करने के लिए मुझे कपड़े बदलकर बाहर आना पड़ा कि आखिर कौन इतना अच्छा गा रही है। मैंने देखा ये तहसीन
आपा थीं। मैं वहाँ बैठ गयी। और उनकी गायकी का खूब मजा लिया।
माशा अल्लाह! क्या बेहतरीन
आवाज थी।
उन दिनों ऑफिस के लोगो में एक
गहमा-गहमी थी। दरअसल, ट्रांस्पैरेंसी इंटर्नेशनल, बंगलादेश के एक्जीक्युटिव
डायरेक्टर एक इंटेलिजेंट अंतर्राष्ट्रीय पर्सनॉलिटी होने के साथ-साथ ऑफिस के लोगों के
चहेते हीरो भी थे। उन्हें
संस्थान के हेडक्वार्टर बर्लिन में ज्वॉइन करने का निवेदन मिला था ताकि उनके अनुभवों का लाभ पूरी दुनिया
को मिल सके। वे जाना भी चाहते थे, लेकिन हमारे ऑफिस के लोगों ने उन्हें अपने
पास ही रोकने के लिए युद्ध स्तर पर जोर लगा रखा था। सब जगह रोना-गाना मचा
हुआ था। गंभीर बहस
चालू थी। कुछ लोग कहते थे कि उन्हें जाना चाहिए। उन्होंने बहुत किया हमारे लिए हमारे देश के लिए। अब उन्हें अपना भविष्य और उन्नत करना चाहिए। साथ ही इससे उन्हें अपने परिवार
के साथ वहाँ पर बिताने के लिए ज्यादा वक्त भी मिलेगा जो कि वे अपनी बड़ी होती बेटी
के लिए चाहते भी थे। लेकिन, बहुत-से लोगों का कहना था कि वे चले जायेंगे तो पूरा
एंटी करप्सन मूवमेंट प्रभावित हो जायेगा। हमारा काम फुल स्विंग पर है। बहुत नाज़ुक हो जायेंगे हालात अगर
वे चले गये तो। लोग कहते थे बात सिर्फ ऑर्गनाइज़ेशन की नहीं है। बात देश की भी है। और अगर इफ्तिखार उज्ज़मान चले गये तो बहुत ज्यादा
नुकसान होगा।
मैं उन्हें बहुत एडमायर करती हूँ
लेकिन मेरा मानना था कि उन्हें जाना चाहिए। और, रही बात बंगलादेश की तो यहाँ उन्होंने
५००० के करीब जो वॉलंटियर तैयार किये हैं, वे लोग काम आगे बढ़ाएँगे। उनके
हेड ऑफिस जाने से टीआईबी का सम्मान बढ़ेगा। साथ-ही-साथ उनके कुछ पर्सनल
रीजन्स के लिहाज़ से भी यह बेहतर होगा।
बाथरूम की तरफ जाते हुए मैंने
तहसीन आपा को सुना। वे अकेली ही लोगों से बहस कर रही थीं कि सर को जाने देना चाहिए।
पर लोग उनकी बात का बुरा मान रहे थे। मैंने तुरंत वह पहुँच कर उनका पक्ष लिया। उनको बड़ी राहत
हुई। सबके जाने के बाद कहने लगीं, “तुमने मेरी बात सही मानी,
मुझे अच्छा लगा, वरना लोग
तो मेरे बारे में उल्टा-सीधा बोल रहे हैं।” फिर तुरंत अपने पहले वाले भाव
में आकर बोलीं, “हुँह! मुझे
परवाह नहीं होती लोगों की। चाहे कोई कुछ भी कहे, मुझे फर्क नहीं पड़ता।” मैंने कहा, हाँ सही बात और फिर
मैं भाग ली।
6 दिन बीत गए। हम लोग वापस ढाका आ
गये।
मैंने पीछा नहीं छोड़ा तहसीन आपा
का। अब मैं उन्हें
हँसाने की कोशिश में लगी रही। मैं अक्सर जाकर उनसे फिजा का हालचाल पूछती।
वे संक्षेप में बता देतीं। मैंने उसे घर लाने का नेवता भी दिया था जिस पर वे बस
मुस्कुरा दीं।
3 दिन बाद फिर से हम लोगों को एक 2
दिन की आवासीय ट्रेनिंग के लिए वहीं जाना पड़ा। यहाँ के रुल के मुताबिक माँ अपने छोटे बच्चे के साथ आ सकती है किसी भी
आवासीय ट्रेनिंग के लिए। इस बार वे फिजा को लेकर आयीं क्योंकि उन दिनों उसकी
छुट्टियाँ थीं और घर पर उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। चूँकि इसी बीच मैंने
खरगोश पाल लिया था, सो उन्हें
भी मैं अकेला नहीं छोड़ सकती थी। वे भी मेरे साथ गये। वहाँ जाते ही हम दोनों फिर से एक हो
गये। इस बार तो खरगोश भी थे, फिजा का सारा ध्यान बस मेरे आस-पास रहने में ही लगा रहता था।
और उसकी मम्मी उतनी ही परेशान। लेकिन पहले वाली गेदरिंग और इस बात की ट्रेनिंग के बीच में
मुझे यह एहसास हुआ की आपा को इतना यकीन हो गया था कि हिन्दू भारतीय होकर भी मैं अच्छी
लड़की हूँ। उनके हिसाब
से सभ्य भी। इसलिए वे मुझसे थोड़ा और अच्छे से, थोड़ी-बहुत ही सही बात करने लगी थीं।
ट्रेनिंग के दौरान मैं और फिजा
चुपके से हाल से गायब हो जाते थे। और सारा दिन खरगोशों की रखवाली और देखरेख में
व्यस्त रहते। अंदर न मेरा मन लगता न ही उसका। उसकी मम्मी भी समझ गयी की फिजा तो
ट्रेनिंग में उनके साथ शांति से बैठने वाली नही हैं, तो उन्होंने मुझे हिदायत दी की मैं
हर पल नज़र रखूँ उनकी बेटी पर। एक पल के लिए भी उसे अकेला न छोडूँ। और तो और उन्होंने उसे
एक फोन भी दे दिया और हर आधे घंटे पर उसकी खबर लेतीं। कभी-कभार हम दोनों पारी बाँध
लेते कि जब तक मै ट्रेनिंग में हूँ, वह बिल्ली और कौवे से खरगोशों की रखवाली करेगी।
हमने खूब एन्जॉय किया। तहसीन आपा ने धीरे-धीरे उसे मेरे भरोसे ही छोड़ दिया। वे
मुझसे बातें शेयर करने लगी, हम साथ डिनर भी करने जाने लगे।
ट्रेनिंग ख़त्म हुई। हम फिर से
ढाका की ओर रवाना हुए। लॉजिस्टिक अरेंजमेंट कुछ ऐसा था कि हम लोग एक ही कार में बैठे। रास्ते
में खूब बातें हुईं। हमने हिंदी में बातें कीं। पता चला कि वे पुरानी हिंदी फिल्मों की बहुत शौकीन रही
हैं, आर डी
बर्मन और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल तो उनके फेवरेट रहे हैं। हमने साथ में उनके पसंदीदा किशोर कुमार और महेंद्र कुमार के गाने
भी गाये। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें दुःख होता है ये देखकर कि फिजा का संगीत में कोई
रुझान नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी भारत देखने की इच्छा है। वे कभी जरुर जाना चाहेंगी।
उन्होंने वादा किया कि वे फिजा को लेकर किसी फुर्सत वाले दिन मेरे घर जरुर आयेंगी। फिर उदास हो गयीं, बोलीं, “शादी के पहले मैं बहुत गाती थी, लेकिन बाद में सब छोड़ दिया।”
उसके बाद से वे हर दूसरे हफ्ते मेरी फोन पर फिजा से बात करवातीं।
अपने प्लान्स के बारे में बतातीं। और, कभी-कभी ऑफिस में हम बंग्लादेश के चिंताजनक
पॉलिटिकल मुद्दों पर गंभीर होकर बातें करते। उनका अंदाज हमेशा वही रहा, बेबाक। दो टूक बोलकर तन जाना। एकदम कॉन्फिडेन्ट।
ये कहना वे कभी नहीं भूलती थीं, “मेरे बारे में कोई कुछ भी कहे, मुझे परवाह नहीं होती।”
अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने पूछा, “तुम्हारी नाक में तो परसिंग के
निशान हैं फिर कुछ पहनती क्यों नहीं। मैंने कहा मुझे पसंद नहीं है। बचपन में मेरी आया ने करा दिया था
पर मुझे अच्छा नहीं लगा तो कभी कुछ पहना नहीं। लेकिन ये निशान तो अब जाता
है नहीं, तो रह गया।
वे बोलीं, “मुझे लगा
किसी रुढ़िवादी विश्वास के कारण कराया होगा।” मैंने पूछा, “अच्छा ! आपके यहाँ ऐसा कोई विश्वास है क्या? तो बोली, “हाँ, मेरी शादी के बाद मेरी सास मेरे
पीछे पड़ गयी नाक छिदवाने के लिए। कहती थी इससे पति की उम्र लम्बी
होती है।” सास
उन्हें बहुत डाँटती थी। कहती थी कि तुम्हें अपने पति की
कोई परवाह नहीं है। जाहिल हो तुम। तो उन्होंने एक दिन पलट कर जवाब दिया कि अगर मेरी
नाक छिदने से पति की उम्र बढ़ती है तब तो मुझे पूरी नाक में सैकड़ों छिद्र करवा
लेने चाहिए। मेरा पति
अमर हो जायेगा। और फिर उन्होंने कभी अपनी नाक नहीं छिदायी।
मैंने कहा इसका मतलब आपके पति
बहुत ही सपोर्टिव हैं। तभी तो इतने रुढ़िवादी ससुराल से होने के बाद भी आप
स्वतंत्र हैं और सफलतापूर्वक अपना काम कर रही है। कुछ पल बाद वे बोलीं, “नहीं, मेरे पति भी बहुत
परम्परावादी हैं। मुझे लड़ना
पड़ता है, अपने हक के लिए, हर जगह।
हम अक्सर बातें करते हैं और कभी-कभी वे
बहुत भावुक हो जातीं। अक्सर आते-जाते मेरे पास चली आतीं। बड़े मन से बातें
करती हैं। तब तक जब तक कोई उन्हें किसी काम से आवाज न दे दे। हम समझ रही थीं-
बहनापे का एक बंधन। बहनापा धर्म और राष्ट्र की सीमाओं से परे हमें एक मजबूत सूत्र
में बाँध रहा था। दुनिया में हर जगह औरतें एक ही युद्ध लड़ रही हैं— साथ-साथ।
निदा फ़ाज़ली कि एक लाइन याद आ
गयी—
हर आदमी में होते हैं, दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।
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