Sunday, November 13, 2011

गौरैया






मै सात साल की थी जब एक गौरया का घोसला मुझसे अनजाने में उज़ड गया था .


दरअसल जब से मुझे पता लगा की घोसले में अंडे आ गए है , मै अपनी तरफ से उनकी हिफाज़त में लग गयी. कोई कौवा न मार दे, कही पापा न देख ले नही तो गन्दगी के डर से घोसला फेक देंगे अदि अदि . कुछ दिनों बाद बच्चे अन्डो से बाहर निकल आये. मुझे बड़ा कौतुहल होता , मै झांक कर उनकी सलामती इंस्योर कर आती , बहुत खुश होती थी मै उन दोनों बच्चों  को देख कर. मेरा मन होता था उनके साथ खेलने का, बातें करने का. पर मै बस झांक के चली आती थी , एक तो उनकी माँ वहाँ बैठी होती , दूसरे मुझे मेरे पापा का डर था , जिनकी जानकारी में ये घोसला अभी तक नही था.

एक दिन दोपहर की बात है. गौरया अपने बच्चों को छोड़ के शायद दाना लाने गयी होगी, मुझे चिंता होने लगी की बच्चों  को अगर भूख -प्यास लग गयी तो खायेंगे क्या , पता नही उनकी माँ कहा गयी है और जाने कब तक आयेगी.

मेरे घर में डाबर लाल दन्त मंजन के ढेर सारे  डिब्बे थे, पापा –मम्मी वही इस्तेमाल करते थे न इसलिए . मै इन खाली  डिब्बों के पीछे इस लिए भागती , क्योंकि उनके ढक्कन मेरी गुडिया के किचेन में काम आते थे , मतलब वे उनकी खाना बनानें और खाने के प्लेट के काम काम आते थे. जब गुडिया मर जाती थी , तो उसकी अर्थी के साथ एक ढक्कन में थोड़ा चावल ,किसी में थोड़ा डाल वगैरह रख के गुडिया के साथ दफ़न कर दिया जाता था. क्योंकि मैंने हातिम ताई की कहानियों में सुना था , आदमी मर जाता है तो उसके साथ कपड़े खाना वगैरह भी दफना देते  है ताकि आदमी को मरने के बाद भी कोई दिक्कत ना हो .

जब मैंने देखा की चिड़िया के बच्चे अकेले हो गए है तो मै जल्दी जल्दी गुड़िया के घर से दो डाबर लाल दन्त मंजन के ढक्कन ले आयी. एक में पानी भरा दूसरे में चावल और मै पापा की स्टडी टेबल किसी तरह मैनेज करके घोसले तक आराम से पहुँच गयी . मैंने उनके दरवाजे पे खाना पानी रख दिया. पर बच्चे आ ही नही रहे थे खाने के लिए  . मुझे लगा वो डर रहे है या हो सकता है उन्हें ढक्कन में से खाने न आता हो . यही सोच के मैंने दीवाल पे टंगे एक कैलेंडर से उसकी डंडी निकाल  ली,और चूँकि मुझे चिड़िया को हाथ से खिसकाने में डर लग रहा था , डंडी का इस्तेमाल करके मैंने हौले हौले उनको ढक्कन की तरफ धकेलने की कोशिश की . मै आज भी अपने माँ की कसम खाके कहती हू , मेरा इरादा  बहुत पाक था , मै उनका भला चाहती थी, मै उन्हें खुश देखना चाहती थी, वो मेरे दोस्त  थे मुझे यकीन था; लेकिन हुआ  वो ,जिसका बोझ आज भी मै हटा नही पायी .

कल मेरा तेइसवा जन्मदिन है , सोलह साल हो गए इस घटना को पर सब कुछ हुबहू एक दम ताज़ा बना हुआ है . बहुत देर तक रो के उठी हू अभी ..घर की बहुत याद आ रही थी, बहुत मन हो रहा था कोई अपना अभी मेरे पास होता. पर ऐसा  कभी नही होता . जब भी मुझे बहुत जरुरत होती है अपने लोगो की मै  कभी उन्हें फिसिकली अपने पास नही पाती हू . और जब जब एइसा होता है मुझे उस चिड़िया की याद आती  है , मै और भी रोती. आज तो मै रो रो के कह भी रही थी , की चिड़िया मेरी कोई गलती नही थी. मैंने कुछ जान बुझ के नही किया. मैंने बहुत झेल लिया, बचपन से लेकर अब तक, प्लीज़ मुझे माफ कर दो . मै जानती हू मुझसे गुनाह हो गया लेकिन मै  कर भी क्या सकती थी . मै बच्ची थी मै सम्भाल नही पायी . मुझे माफ कर दो .
चिड़िया को मैंने घोसले के मुहाने पे रखे ढक्कन के पास लाने  की बहुत कोशिश की , चावल न सही मै चाहती थी कम से हम दो बूंद पानी तो वो लोग पी  ले . गर्मी की दुपहरिया थी , मुझे लगा उन्हें जरुर बहुत प्यास लगी होगी . अचानक , एक चिड़िया फडफडाने लगी और ढक्कन के पास आने के बजाय  उसने उड़ने की कोशिश की . मै डर गयी . और मै कुछ समझ पाती इसके पहले ही चिड़िया उड़ गयी . और ............. घर में पंखा चल रहा था ..और  मैंने देखा, कमरे में चिड़िया के पंख यहाँ  वहाँ  बिखरे उड़ रहे थे . मै स्तब्ध रह गयी . मुझे महसूस भी नही हो सका की मुझे क्या महसूस हो रहा है. चिड़िया मर गयी. मुझे याद नही अगले सीन तक मै कहा थी और क्या कर रही थी . जो अगली बात याद है वो ये की आंगन में मैंने चिड़िया के दूसरे बच्चे को सीवर पाइप के पास तडफड़ाते देखा . वो बच्चा भी मर गया.

चिड़िया की माँ घर वापस आई थी , पर उसने वो घोसला छोड़ दिया . वो कुछ दिनों तक आती  रही , उड़ उड़ के पूरा घर घुमा करती थी. और फ़िर हमेशा के लिए घर से चली गयी. कुछ दिनों बाद पापा ने सफाई करते वक्त घोसला देखा और उसे फेंक दिया . मुझे याद नही मैंने किसी से ये घटना शेयर की या नही . लेकिन वक्त बक्त  पे ये बात मेरे मन में गहरी बैठती गयी की मुझे चिड़िया  का श्राप लग गया है, कब छूटेगा नही मालूम . उसके बाद भी मैंने न जाने कितनी घायल चिडियाँ की मदद की , एक को तो गोद में छिपाके  मैंने एक्साम भी दिया था, उसे कौए ने बुरी तरह मारा था . फ़िर एक पिल्ला था वो बेचारा भी पता नही कैसे घायल हो गया था , मेरी सहेलियों ने उसे लाकर मुझे दे दिया था . मैंने उसे बहुत प्यार दिया लेकिन एक दिन वो भी मर गया , उसकी कब्र मैंने होस्टल के पीछे बहुत अच्छे से खोद के बनायीं थी . और भी बहुत थे, एक कबूतर जिसे बिल्ली ने मार दिया था , वार्डेन से छुपाके  उसे मैंने आपने बेड के नीचे पाला , रात रात भर जाग के  उसकी सुरक्षा की, तब तक, जब तक वो  जिंदा रहा , फ़िर कभी एक बिल्ली भी आयी थी और यु ही सब आते रहे जाते रहे . मैंने कभी किसी को तन नही किया बहुत प्यार किया उन सब को , पर चिड़िया का श्राप मुझसे उतरा नही .

फिफ्थ के बाद ही मै होस्टल चली गयी थी . मुझे घर की बहुत याद आती थी . लेकिन स्कूल का रुल था महीने में केवल दो बार पैरेंट्स से मिल सकते है , मेरी दीदी फ़िर भी हर हफ्ते मुझसे मिलने आती . मुझे नहलाती थी और खाना खिलाती थी, मेरे बाल सवारती थी, नाख़ून भी काटती  थी और जब मै घर जाने की बहुत जिद करती थी तो नकली बहाने बना के मुझे छुट्टी भी दिला लेती थी .

मै हर दो हफ्ते में एक बार तो जरुर खूब जोर जोर  से देर तक रोती थी . कभी चादर में छुप के तकिये पर, तो कभी होस्टल के पीछे जेनेरेटर रूम में अकेले बैठ बैठे . मुझे चिड़िया का ख्याल जरुर  आता. और मेरी रुलाई कुछ  एइसे ही हो जाती जैसे आप जानते है की आपसे पाप हो गया लेकिन आपने पाप किया नही था . मै कैसे समझाती . चिड़िया तो मुझे कभी मिली नही न, मिल भी जाती तो क्या समझ पाती मुझे . मेरी वजह से उसका घर बर्बाद हो गया ऊसके दो छोटे छोटे बच्चे इतनी बुरी तरह मर गए, कैसे माफ करती वो मुझे. मुझे जरुर उसने श्राप दिया होगा की मै भी हमेशा अपने लोगों से दूर ही रहूंगी .


मेरी बहुत सी पक्की सहेलियां हुयी लेकिन पहले माँ की नौकरी  के साथ साथ घूमने के कारण , और बाद में मेरी पढाई और बदलते शहरों के कारन सब छूट जाती. वो बहुत अच्छी है और मुझे प्यार करती हैं  . मुझे याद आती  है उन सब की.

और जब बहुत याद  आती है , इतनी की आँसू  आ जाते है तब मुझे चिड़िया की भी याद आती है. आज मुझे बहुत याद आई . मै बहुत रोई हू . मेरा तकिया भींग गया है और चेहरा सुज़ गया. सोचा क्या  पता इस बात को  लिख देने से या किसी को बता देने से ये अपराधबोध मेरे मन से निकल जाये. 

Wednesday, September 21, 2011

मुख्यमंत्री मायावती और दलित


स्कूल के दिनों में मायावती से मेरा खासा लगाव शुरू हुआ था. बहुत अचंभित करती थी ये महिला मेरे बच्चे से दिमाग को. कारण भी था .


मैंने अपने  नानी और बाबा के गावों में देखा था , छत से दूर  कच्चे  घरों कि कुछ झोपड्पत्तियां, जहाँ पक्की या ईंटे वाली चौड़ी  रोडे नही केवल  मेड जाती थी. और वही से बर्तन माज़ने वाली कहारिन अम्मा आती थी, दालान और दुवार बुहारने वाले बूढ़े काका भी (जिनके बीड़ी प्रेम ने एक बार मुझे भी प्रेरित किया था छुप के  कम से कम एक बार तो जरुर उनकी बीड़ी पी  जाय, लेकिन दुर्भाग्य वश धुआं  छोटे से फेफड़े में एइसा भरा की होश आने पे मेरे चारो तरफ लोग  ही लोग थे और मामा जी भी जिनसे आज भी मुझे  उतना ही  डर लगता है, वे मामी को  मुझे घी पिलाने की सलाह दे रहे थे  )  उसी दिशा से आते थे. शादी बियाह का बाजा  थमने के बाद घूर पर से पत्तलों कि बची जूठन थैलों में समेटते परिवार (जिनको नानी डोम बताती थी ) भी वापस उधर ही चले जाते थे. 


 ड्यूटी से वापस आने के बाद जैसे कि माँ का दिन पूरा ही नही होता था बिना  दिन भर कि बातें पापा से साँझा किये . कभी कभी वो   फुल एक्टिंग के साथ हम लोगो से बताती थीं कि कैसे एक दलित एरिया में टूर के दौरान एक महिला हाथ चमका चमका के ऊपर वाले से  बड़े ताव  से कह रही थी कि, "हे भगवान् बस एक बार हमार मायावती बिटिया चुनाव जित जाय, कुर्सिया पे बैठ जाये, एकरे बाद त जवन बुध्ही ठंठाई बाम्हन ठकुरन क कि उन्हहने के घमंड का पिल्लुद्दा न निकल जाय त हमर नाव नाही". कभी कभी तो मैंने खुद देखे  है एइसे सीन . भाई नेता हों तो एइसा जिसके नाम से भी उसकी जनता का सर ऊँचा हों जाय , वो  जनता  भी अगर एईसी हों कि सदियों से बेइज्जती और लात  जूता ही इन्हें दुनिया ने  दिया  हों ,तो भाई वाह!! क्या नेता पैदा हुआ है और उस पर भी क्या सिस्टम जिसने एइसे हालत में एइसा नेता पलने दिया , पोसा और गद्दी पर ले जाके खड़ा कर दिया. 


और कोई माने न माने लेकिन हकीक़त  है कि मायावती के राज़ में उत्तर प्रदेश का समाज बहुत बदला है , चमार -सियार जैसे शब्दों की  फ्रीक्वेंसी  बहुत कुछ खो गयी है और कम से कम इसका उदहारण  उचित नही माना जाता . इस पीढ़ी को बाबा साहब अम्बेडकर का इतिहास और भारत निर्माण  में उनके कीमती योगदान का पता चलने दिया गया है. पोलिस या सवर्ण जातियां  केवल छोटी सी गलती पर या केवल  शक कि बिनाह पर ही लाठी नही बरसा सकते अब किसी पर भी , सिर्फ इसलिए कि वो हरिज़न है. दलितों पर हाथ डालते कम से कम एक बार वो हुक्मरान अन्दर  से हिलते जरुर होंगे . और कम से कम  जनता के एक तबके के साथ ऐसे किये जाने वाले ऐसे क्रूर कुकर्मो को   पिछले कुछ सालों में मिडिया कभी कभार ही सही , थोडा बहुत ही सही पर जगह  देने लगी है . 


और उससे भी बड़ी बात बसपा के बढ़ाते कदम के साथ साथ एक पूरी पिछड़ी हुई जाती के सपने भी  उठे है , उन्हें लगने लगा है कि वो सिर्फ झाड़ू, जूता चप्पल ,कूड़ा कचरा के लिए ही नही जन्मे है , वो भी भारत भाग्य विधाता हों सकते है . अम्बेडकर जी कि जिस अदभुद क्रांति को भुलवाने कि पूरी कोशिश कि गयी बसपा ने उस पर जमी धुल को  साफ करने कि कोशिश कि है. 


लोग शोर करते है कि मायावती अपनी और  अम्बेडकर  साहब कि मूर्तियों से पूरा यु पी पाट रही हैं  , गरीबों का धन अनर्गल खर्च कर रही है . मै मानती हू कि जिस देश में जनता को पेट भर खाने को भी नही मिल रहा है , वहा किसी भी नये प्रोजेक्ट के लिए अपोर्चुनिटी कास्ट का ठीक तरह से मूल्यांकन और बुध्हिमता पूर्ण इस्तेमाल जरुरी है . पर रुकिए ! मूर्ति स्थापना का आपना महत्व रहा है दुनिया में . लन्दन हों या भारत हर जगह ये पुरानी संस्कृति है. भारत के ही उदाहरन लें तो आज़ादी के बाद से कितनी मुर्तिया बनी बिगड़ी किसी ने कभी पैसे का हिसाब जोड़ा ? किसी को बुरा लगा कि देश मूर्तियों से पट रहा है? नहीं न !! तो मायावती या अम्बेडकर कि मूर्ति में एइसा क्या है ? ये इतना शोर क्यों है ?


क्या ये हमारे अन्दर कि इर्ष्या , जलन भुनन और उठा पटक नही है कि वर्षो से हमारे पुरखों के सामने जिनकी आँख उठाने कि भी हिम्मत नही थी , आज उनकी बिच शहर में मूर्ति कैसे खड़ी हों रही है ?  मै समझती हूँ , मूर्ति स्थापना का प्रतिकात्मक अर्थ है किसी विचारक, विचारधारा , आदर्श, महापुरुष ,उम्मीद या क्रांति को इज्ज़त पेश करना और अगली पीढ़ी का  भी इनसे इत्तिला करवाना. इस तरह अम्बेडकर के सामाजिक योगदान पे तो कोई शक ही नही , (हालाँकि फिर भी  उसे दबाने कि  भरपूर और लगभग सफल कोशिश  जी जान से कि गयी ) मायावती का महत्व भी मान ही लेना चाहिए सवर्ण  समाज को . माना कि उनसे इनके इगो को चोट पहुंचती है पर भी इतना बौखलाने कि जरुरत नही होनी चाहिए कम से कम तब तो बिलकुल भी नही जब आप अपने समाज के प्रगतिवादी होने का डंका पीट रहे हों.  


खैर!! ये तो रही एक बात की मायावती के पद ने पिछड़े समाज का आत्मविश्वाश बढ़ाया है और इस तबके में  आत्मविश्वाश का जागना और बढना आपने आप में ऐतिहासिक महत्त्व रखता है , लेकिन इसके आलावा मुझे मलाल है इस बात का की महिला और भी बहुत कुछ  कर  सकती थी या कर  सकती है  पर कर नही रही. वक्त बितता जा रहा है पता नही भविष्य में क्या है बसपा के लिए . पर मायावती ने अपनी बहुमत सरकार में भी एक भी एइसा बिल नहीं  पारित करवाया  जो वास्तव में पालिसी स्तर पर  कुछ भी बदलाव लाता और दलितों का भविष्य मज़बूत करता .
इनको जो मौका मिला उसका भरपूर उपयोग करने के बजाय देवी जी प्रधानमंत्री की कुर्सी का सपना बुनने लगीं . बुने! जरुर बुने ! ये सफल हुआ तो इससे अच्छा क्या होगा . लेकिन इस वर्ग की आने वाली पीढ़िया बहुत तेज़ और समझदार भी होंगी और शायद उन्हें न समझ में आये की सवर्णों के सताए उनके बाप दादा को मायावती के गद्दी नाशिन होने से क्या भावनात्मक सुख मिला ,पर वो ये खोजेंगी और जानना  चाहेंगी की मायावती ने लोकतंत्र में एइसा क्या ठोस किया जो उनके भी काम  आये . कौन  से ,एक्ट और कानून स्थापित किये ?अपने  आलावा कितने और दलित नेता निखारे, इत्यादि. 


ये सब मै इसलिए  कह  रही हु क्योंकि जैसे जैसे मै बड़ी हुई, मेरे मन में ये सवाल आते रहे है . जिस सिस्टम ने इन्हें नेता बनाया  उसकी भी असलियत मै समझती हु अब . नानी और बाबा के गावों से इतर गाव भी देखे है मैंने अब . तमाम फूलते और फुस्स होते खयाली गुब्बारे भी देखे है मैंने . इस सिस्टम और इसके नेताओं से जलती और फिर बुझती उम्मीदे भी देखी है मैंने . लेकिन थोडा लगाव था मायावती से. आशा है वो बिलकुल निराश नही करेंगी .


आपकी शुभाकांक्षी 
-आकांक्षा