स्कूल के दिनों में मायावती से मेरा खासा लगाव शुरू हुआ था. बहुत अचंभित करती थी ये महिला मेरे बच्चे से दिमाग को. कारण भी था .
मैंने अपने नानी और बाबा के गावों में देखा था , छत से दूर कच्चे घरों कि कुछ झोपड्पत्तियां, जहाँ पक्की या ईंटे वाली चौड़ी रोडे नही केवल मेड जाती थी. और वही से बर्तन माज़ने वाली कहारिन अम्मा आती थी, दालान और दुवार बुहारने वाले बूढ़े काका भी (जिनके बीड़ी प्रेम ने एक बार मुझे भी प्रेरित किया था छुप के कम से कम एक बार तो जरुर उनकी बीड़ी पी जाय, लेकिन दुर्भाग्य वश धुआं छोटे से फेफड़े में एइसा भरा की होश आने पे मेरे चारो तरफ लोग ही लोग थे और मामा जी भी जिनसे आज भी मुझे उतना ही डर लगता है, वे मामी को मुझे घी पिलाने की सलाह दे रहे थे ) उसी दिशा से आते थे. शादी बियाह का बाजा थमने के बाद घूर पर से पत्तलों कि बची जूठन थैलों में समेटते परिवार (जिनको नानी डोम बताती थी ) भी वापस उधर ही चले जाते थे.
ड्यूटी से वापस आने के बाद जैसे कि माँ का दिन पूरा ही नही होता था बिना दिन भर कि बातें पापा से साँझा किये . कभी कभी वो फुल एक्टिंग के साथ हम लोगो से बताती थीं कि कैसे एक दलित एरिया में टूर के दौरान एक महिला हाथ चमका चमका के ऊपर वाले से बड़े ताव से कह रही थी कि, "हे भगवान् बस एक बार हमार मायावती बिटिया चुनाव जित जाय, कुर्सिया पे बैठ जाये, एकरे बाद त जवन बुध्ही ठंठाई बाम्हन ठकुरन क कि उन्हहने के घमंड का पिल्लुद्दा न निकल जाय त हमर नाव नाही". कभी कभी तो मैंने खुद देखे है एइसे सीन . भाई नेता हों तो एइसा जिसके नाम से भी उसकी जनता का सर ऊँचा हों जाय , वो जनता भी अगर एईसी हों कि सदियों से बेइज्जती और लात जूता ही इन्हें दुनिया ने दिया हों ,तो भाई वाह!! क्या नेता पैदा हुआ है और उस पर भी क्या सिस्टम जिसने एइसे हालत में एइसा नेता पलने दिया , पोसा और गद्दी पर ले जाके खड़ा कर दिया.
और कोई माने न माने लेकिन हकीक़त है कि मायावती के राज़ में उत्तर प्रदेश का समाज बहुत बदला है , चमार -सियार जैसे शब्दों की फ्रीक्वेंसी बहुत कुछ खो गयी है और कम से कम इसका उदहारण उचित नही माना जाता . इस पीढ़ी को बाबा साहब अम्बेडकर का इतिहास और भारत निर्माण में उनके कीमती योगदान का पता चलने दिया गया है. पोलिस या सवर्ण जातियां केवल छोटी सी गलती पर या केवल शक कि बिनाह पर ही लाठी नही बरसा सकते अब किसी पर भी , सिर्फ इसलिए कि वो हरिज़न है. दलितों पर हाथ डालते कम से कम एक बार वो हुक्मरान अन्दर से हिलते जरुर होंगे . और कम से कम जनता के एक तबके के साथ ऐसे किये जाने वाले ऐसे क्रूर कुकर्मो को पिछले कुछ सालों में मिडिया कभी कभार ही सही , थोडा बहुत ही सही पर जगह देने लगी है .
और उससे भी बड़ी बात बसपा के बढ़ाते कदम के साथ साथ एक पूरी पिछड़ी हुई जाती के सपने भी उठे है , उन्हें लगने लगा है कि वो सिर्फ झाड़ू, जूता चप्पल ,कूड़ा कचरा के लिए ही नही जन्मे है , वो भी भारत भाग्य विधाता हों सकते है . अम्बेडकर जी कि जिस अदभुद क्रांति को भुलवाने कि पूरी कोशिश कि गयी बसपा ने उस पर जमी धुल को साफ करने कि कोशिश कि है.
लोग शोर करते है कि मायावती अपनी और अम्बेडकर साहब कि मूर्तियों से पूरा यु पी पाट रही हैं , गरीबों का धन अनर्गल खर्च कर रही है . मै मानती हू कि जिस देश में जनता को पेट भर खाने को भी नही मिल रहा है , वहा किसी भी नये प्रोजेक्ट के लिए अपोर्चुनिटी कास्ट का ठीक तरह से मूल्यांकन और बुध्हिमता पूर्ण इस्तेमाल जरुरी है . पर रुकिए ! मूर्ति स्थापना का आपना महत्व रहा है दुनिया में . लन्दन हों या भारत हर जगह ये पुरानी संस्कृति है. भारत के ही उदाहरन लें तो आज़ादी के बाद से कितनी मुर्तिया बनी बिगड़ी किसी ने कभी पैसे का हिसाब जोड़ा ? किसी को बुरा लगा कि देश मूर्तियों से पट रहा है? नहीं न !! तो मायावती या अम्बेडकर कि मूर्ति में एइसा क्या है ? ये इतना शोर क्यों है ?
क्या ये हमारे अन्दर कि इर्ष्या , जलन भुनन और उठा पटक नही है कि वर्षो से हमारे पुरखों के सामने जिनकी आँख उठाने कि भी हिम्मत नही थी , आज उनकी बिच शहर में मूर्ति कैसे खड़ी हों रही है ? मै समझती हूँ , मूर्ति स्थापना का प्रतिकात्मक अर्थ है किसी विचारक, विचारधारा , आदर्श, महापुरुष ,उम्मीद या क्रांति को इज्ज़त पेश करना और अगली पीढ़ी का भी इनसे इत्तिला करवाना. इस तरह अम्बेडकर के सामाजिक योगदान पे तो कोई शक ही नही , (हालाँकि फिर भी उसे दबाने कि भरपूर और लगभग सफल कोशिश जी जान से कि गयी ) मायावती का महत्व भी मान ही लेना चाहिए सवर्ण समाज को . माना कि उनसे इनके इगो को चोट पहुंचती है पर भी इतना बौखलाने कि जरुरत नही होनी चाहिए कम से कम तब तो बिलकुल भी नही जब आप अपने समाज के प्रगतिवादी होने का डंका पीट रहे हों.
खैर!! ये तो रही एक बात की मायावती के पद ने पिछड़े समाज का आत्मविश्वाश बढ़ाया है और इस तबके में आत्मविश्वाश का जागना और बढना आपने आप में ऐतिहासिक महत्त्व रखता है , लेकिन इसके आलावा मुझे मलाल है इस बात का की महिला और भी बहुत कुछ कर सकती थी या कर सकती है पर कर नही रही. वक्त बितता जा रहा है पता नही भविष्य में क्या है बसपा के लिए . पर मायावती ने अपनी बहुमत सरकार में भी एक भी एइसा बिल नहीं पारित करवाया जो वास्तव में पालिसी स्तर पर कुछ भी बदलाव लाता और दलितों का भविष्य मज़बूत करता .
इनको जो मौका मिला उसका भरपूर उपयोग करने के बजाय देवी जी प्रधानमंत्री की कुर्सी का सपना बुनने लगीं . बुने! जरुर बुने ! ये सफल हुआ तो इससे अच्छा क्या होगा . लेकिन इस वर्ग की आने वाली पीढ़िया बहुत तेज़ और समझदार भी होंगी और शायद उन्हें न समझ में आये की सवर्णों के सताए उनके बाप दादा को मायावती के गद्दी नाशिन होने से क्या भावनात्मक सुख मिला ,पर वो ये खोजेंगी और जानना चाहेंगी की मायावती ने लोकतंत्र में एइसा क्या ठोस किया जो उनके भी काम आये . कौन से ,एक्ट और कानून स्थापित किये ?अपने आलावा कितने और दलित नेता निखारे, इत्यादि.
ये सब मै इसलिए कह रही हु क्योंकि जैसे जैसे मै बड़ी हुई, मेरे मन में ये सवाल आते रहे है . जिस सिस्टम ने इन्हें नेता बनाया उसकी भी असलियत मै समझती हु अब . नानी और बाबा के गावों से इतर गाव भी देखे है मैंने अब . तमाम फूलते और फुस्स होते खयाली गुब्बारे भी देखे है मैंने . इस सिस्टम और इसके नेताओं से जलती और फिर बुझती उम्मीदे भी देखी है मैंने . लेकिन थोडा लगाव था मायावती से. आशा है वो बिलकुल निराश नही करेंगी .
आपकी शुभाकांक्षी
-आकांक्षा


आकांक्षाजी, बहुत परिपक्व लेख है. मायावती के मामले को ऐसे परिपक्व ढंग से किसी ने डील किया हो, मैंने नहीं देखा-पढ़ा. आपके दृष्टिकोण का प्रचार होना चाहिए. और, टुकड़े-टुकड़े में ऐसे ही लिखती रहें, तो एक दिन आप देख कर आश्चर्य चकित होंगी कि आपकी आत्मकथा तैयार है.
ReplyDeleteThank u. here m writing my random thoughts without editing. your wishes and suggestions would help me to improve .
ReplyDeleteअरे बबुनी....माया महा ठगिनी हम जानी...इनका ऐतबार न कीजो...:D
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